वर्तमान वैश्विक परिदृश्य युद्ध की विभीषिका और सैन्य संघर्षों के काले बादलों से घिरा हुआ है। एक ओर जहाँ मध्य पश्चिम में इज़राइल और गाजा का संघर्ष अपने वीभत्स और अमानवीय रूप में सामने है, वहीं दूसरी ओर रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता को झकझोर कर रख दिया है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब और लाल सागर के व्यापारिक मार्गों पर किए जा रहे हमलों ने नई सामरिक चिंताओं को जन्म दिया है, तो वहीं पाक-अफगान सीमाओं पर जारी तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की सुलगती लपटें भले ही कुछ शांत दिखाई दे रही हों लेकिन वैश्विक शांति पर मंडराता इनका खतरा आज भी कायम है। दुनिया के तमाम देश इन संघर्षों के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारी आर्थिक और कूटनीतिक क्षति झेल रहे हैं, जिससे इन्हें थामने के प्रयास तो हो रहे हैं किंतु इस पूरे कोलाहल में जिस सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी विषय को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, वह है मानवाधिकार।
मानवाधिकारों का मूल दर्शन इसी विचार पर टिका है कि ये वे बुनियादी अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को केवल 'मनुष्य होने के नाते' प्राकृतिक रूप से प्राप्त हैं, न कि किसी विशिष्ट देश, नस्ल, धर्म, लिंग या भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े होने के कारण। वर्तमान वैश्विक विमर्श में भी इनकी प्रकृति को 'सार्वभौमिक' (जो सर्वत्र व्याप्त हैं), 'अंतर्निहित' (जो मनुष्य के अस्तित्व का अभिन्न अंग हैं), 'अहस्तांतरणीय' (जिन्हें किसी अन्य को सौंपा या छीना नहीं जा सकता) और 'अविभाज्य' (जिनके टुकड़े नहीं किए जा सकते) स्वीकार किया गया है। वर्तमान वैश्विक युद्धों और सैन्य संघर्षों के बीच मानवाधिकारों पर विमर्श करना इसलिए अपरिहार्य हो जाता है, क्योंकि युद्ध की इस भयावह विभीषिका में हर रोज़ हज़ारों ऐसे निर्दोष नागरिक अपनी जान गंवाते हैं, जो न तो इस सैन्य टकराव के लिए ज़िम्मेदार हैं और न ही इसकी आकांक्षा रखते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किए गए अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का मुख्य आधार वर्ष 1948 में अपनाई गई 'मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा’ है, जिसका अनुच्छेद 3 स्पष्ट रूप से उद्घोषणा करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वतंत्रता और वैयक्तिक सुरक्षा का अधिकार है। इसी प्रकार, अनुच्छेद 22 समाज के एक सदस्य के रूप में व्यक्ति के गरिमापूर्ण विकास के लिए आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। किंतु समकालीन विश्व का यह क्रूर सच है ये दोनों ही अनुच्छेद आज युद्धक्षेत्रों की ज़मीनी हकीकत में पूरी तरह दम तोड़ते नज़र आ रहे हैं।
वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की नीतियों का पूरी तरह से 'आर्थिक हितों' के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाना भी मानवाधिकारों के इस वैश्विक उल्लंघन का एक मुख्य कारण है। आज मानवीय जीवन की कीमत व्यापारिक मुनाफे और रणनीतिक लाभ के तराजू में तौली जा रही है। उदाहरण के लिए अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव में जान गंवाते निर्दोष नागरिक या व्यापारिक जहाजों पर हमलों में हताहत होते निर्दोष नाविकों से कहीं अधिक चर्चा वैश्विक स्तर पर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बंद होने और वैश्विक तेल आपूर्ति ठप होने की होती है। यही उदासीनता रूस-यूक्रेन युद्ध में भी साफ दिखाई देती है, जहाँ स्वतंत्र मानवाधिकार संस्थाएं एक लाख से अधिक सैनिकों और आम नागरिकों की असामयिक मृत्यु का हृदयविदारक आंकड़ा प्रस्तुत करती हैं, वहीं दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्र केवल 'ग्लोबल सप्लाई चेन' में आने वाली बाधाओं और अनाज संकट पर माथापच्ची करते दिखते हैं। इसी तरह, मध्य पश्चिम के भू-राजनीतिक समीकरणों में कई देश मानवीय संवेदनाओं और नागरिक सुरक्षा को ताक पर रखकर केवल तेल रिफाइनरियों और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा को लेकर अधिक चिंतित नज़र आते हैं। ये तमाम समकालीन उदाहरण इस कड़वी हकीकत को बयां करते हैं कि आज का आधुनिक समाज मानवाधिकारों के प्रति कितना संवेदनहीन और उदासीन हो चुका है।
मानवाधिकारों के वर्तमान संकट को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक विकास-क्रम को जानना अत्यंत आवश्यक है। पाश्चात्य जगत मानवाधिकारों की क्रमिक शुरुआत को वर्ष 1215 के ब्रिटिश 'मैग्ना कार्टा', 1689 के 'इंग्लिश बिल ऑफ राइट्स', 1776 की 'अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा', और 1789 के 'फ्रांसीसी नागरिक अधिकार घोषणापत्र' से जोड़कर देखता है; जिसकी तार्किक परिणति द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना और वैश्विक शांति के साझा प्रयासों के रूप में हुई। किंतु यहाँ एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है, क्या मात्र किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर देने से राष्ट्र अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी निभाएंगे? आज जब स्वयं संयुक्त राष्ट्र जैसी शीर्ष संस्था वैश्विक संघर्षों को रोकने में असहाय और प्रभावहीन सिद्ध हो रही है, तो कागज़ों पर लिखे इन आदर्शों को भला कौन मानेगा? मानवाधिकारों की ज़मीनी संप्रभुता तब तक स्थापित नहीं हो सकती, जब तक दुनिया के देश और समाज इसे अपनी नीतियों, संस्कृति और आंतरिक दार्शनिक चेतना में आत्मसात न कर लें और इसे मनुष्यता का एक अनिवार्य व अभिन्न हिस्सा न मानें। सभ्यता के मूल्यों में मानवाधिकारों के इसी सहज समावेशन का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हमें प्राचीन भारतीय दर्शन में देखने को मिलता है।
आधुनिक भारत का संविधान भले ही अपने 'मौलिक अधिकारों' के माध्यम से प्रत्येक नागरिक के मानवाधिकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है, किंतु भारतीय चेतना और संस्कृति में इन अधिकारों के उद्गम स्रोत अत्यंत प्राचीन हैं। पाश्चात्य जगत के आधुनिक घोषणापत्रों से सदियों पूर्व, भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद (5.60.5) में यह कालजयी उद्घोषणा की गई थी - 'अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय' अर्थात मानव समाज में जन्म या जाति के आधार पर न तो कोई श्रेष्ठ (बड़ा) है और न ही कोई निम्न (छोटा); सभी मनुष्य समान रूप से सहोदर (भाई-भाई) हैं और सबको परस्पर सहयोग के साथ सामूहिक समृद्धि व सौभाग्य की ओर बढ़ना चाहिए। ऋग्वेद जहाँ जन्मजात समानता के इस सार्वभौमिक सिद्धांत को स्थापित करता है, वहीं अथर्ववेद का 'सांमनस्य सूक्त' (3.30) आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की एक सुदृढ़ व्यावहारिक व्यवस्था प्रस्तुत करता है। इस सूक्त का छठा मंत्र - 'समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः' स्पष्ट रूप से निर्देशित करता है कि समाज के सभी वर्गों का जल स्रोतों (पेयजल) और अन्न (भोजन) जैसे जीवन-रक्षक बुनियादी संसाधनों पर समान अधिकार होना चाहिए। यह प्राचीन दर्शन सिद्ध करता है कि भारत के लिए मानवाधिकार कोई आयातित विचारधारा नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक आत्मा का हिस्सा रहे हैं।
युद्धों व सैन्य संघर्षों के अलावा अन्य कारण भी मानवाधिकारों पर चर्चा को आवश्यक बनाते हैं। जिसमें सबसे आत्मघाती कारण 'जलवायु परिवर्तन' और तीव्र गति से हो रहा पर्यावरण विनाश है। ग्लोबल वार्मिंग, बड़े पैमाने पर प्रदूषण और अनियंत्रित प्राकृतिक आपदाओं के कारण आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों से उनका सुरक्षित आवास, स्वच्छ पेयजल और आजीविका के साधन छिन रहे हैं। यह भयावह स्थिति मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणापत्र के अनुच्छेद 25 का खुला उल्लंघन है, जो हर व्यक्ति को एक गरिमापूर्ण जीवन स्तर और स्वास्थ्य का अधिकार देता है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने 'एक स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण में रहने' को एक बुनियादी मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी है। यदि वैश्विक समुदाय ने अपने आर्थिक और औद्योगिक हितों से ऊपर उठकर पर्यावरण विनाश को नहीं रोका, तो आने वाले समय में भुखमरी और विस्थापन का एक ऐसा अभूतपूर्व संकट खड़ा होगा, जो मानवता के अस्तित्व को ही संकट में डाल देगा।
इस संपूर्ण परिदृश्य में सबसे बड़ी विडंबना है कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र असहाय और प्रभावहीन दिखाई दे रही अंतर्राष्ट्रीय संधियों और कानूनों के प्रति यह वैश्विक उदासीनता ही वह मुख्य कारण है जिससे आज दुनिया भर में युद्ध अपराधों और अमानवीय कृत्यों का हौसला बढ़ रहा है। आज मानवाधिकारों को एक अनिवार्य मानवीय आवश्यकता के रूप में देखने के बजाय, देश इसे केवल एक कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं जहाँ वे अपने विरोधी देशों में तो मानवाधिकारों के उल्लंघन पर शोर मचाते हैं, लेकिन अपने आर्थिक व रणनीतिक साझेदार देशों के क्रूर कृत्यों पर पूरी तरह आँखें मूंद लेते हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की यह दोहरी नीति और उदासीनता आज संपूर्ण मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
निष्कर्षतः यह समझना अनिवार्य है कि मानवाधिकार किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा थोपा गया नियम नहीं हैं, बल्कि यह इस धरती पर मनुष्य के अस्तित्व और वैश्विक शांति की पहली शर्त हैं। मानवाधिकारों के प्रति सजगता जरूरी है तथा संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक सुरक्षा परिषद जैसी शीर्ष संस्थाओं में संरचनात्मक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है। जब तक मानवाधिकारों के उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई के लिए संस्थाओं को वास्तविक संप्रभु अधिकार नहीं दिए जाते तब तक ये अंतरराष्ट्रीय निकाय केवल मूक दर्शक बने रहेंगे। समकालीन विश्व को आर्थिक लाभ, सामरिक वर्चस्व और सीमाओं के विस्तार की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर मानवाधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी ही होगी। जैसा कि भारत के प्राचीन दार्शनिक चिंतन 'वसुधैव कुटुंबकम्' और वेदों के सूक्तों में सदियों पूर्व सिखाया गया था - अधिकारों की वास्तविक रक्षा केवल संधियों पर हस्ताक्षर करने से नहीं, बल्कि समाज और वैश्विक नीतियों की आंतरिक चेतना में उन्हें आत्मसात करने से होती है। इन संस्थागत सुधारों के माध्यम से वैश्विक उदासीनता को त्यागना और मानवाधिकारों को मनुष्यता का अभिन्न हिस्सा मानकर अक्षुण्ण रखना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व को तीसरे महायुद्ध और सर्वनाश से बचाने का एकमात्र मार्ग है।

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