परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में भारत ने एक निर्णायक उपलब्धि हासिल की है जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ट्वीट से की। यह उपलब्धि क्लपक्कम स्थित स्वदेशी प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के उस स्थिति तक पहुँच जाने से जुड़ी है जब रिएक्टर स्वयं-संचालित परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया शुरू कर देता है। इस तकनीक की खासियत यह है कि यह केवल ऊर्जा उत्पन्न नहीं करती, बल्कि जितना ईंधन उपयोग करती है उससे अधिक नया ईंधन (प्लूटोनियम) भी तैयार करती है। इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक संस्थागत छलांग के रूप में समझा जा सकता है जहाँ राज्य अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा आवश्यकताओं को बाहरी निर्भरता के बिना सुनिश्चित करने की क्षमता विकसित करता है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि भारत के ऊर्जा-आधारित रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक निर्णायक कदम है। परमाणु ऊर्जा बहुत आसान तरीके से समझें तो परमाणु के टूटने से बनने वाली ऊर्जा है। जब यूरेनियम जैसे तत्व के छोटे-छोटे कण (नाभिक) पर न्यूट्रॉन डाला जाता है, तो वह टूट जाता है और बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करता है। इस गर्मी से भाप बनाई जाती है, और यही भाप टर्बाइन ...
राम नवमी के पावन अवसर पर जब 108 ब्राह्मण बटुकों के स्वस्ति-वाचन, सात शंखनादों की गूंज और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अष्टमंगल पाठ के बीच बलेन्द्र शाह ने नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक औपचारिक राजनीतिक घटना नहीं रही बल्कि इसने नेपाल की स्थापित राजनीतिक परंपराओं और धारणाओं को बदल दिया। वैदिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रतीकों से परिपूर्ण इस शपथग्रहण ने हिन्दू राजनीति के उस विमर्श को पुनर्जीवित कर दिया, जो लंबे समय से नेपाल की राजनीति के हाशिये पर चला गया था। यह दृश्य बताता है कि नेपाल एक बार फिर अपनी राजनीतिक संरचना में हिन्दू मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है। यह घटनाक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि 2006 के बाद नेपाल के संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में पुनर्परिभाषित होने और धर्मनिरपेक्षता को शासन का अभिन्न तत्व बनाकर वामपंथी दलों के प्रभुत्व ने एक ऐसी राजनीतिक छवि निर्मित की, जिसमें हिन्दू प्रतीकों और वैदिक परंपराओं की भूमिका सीमित होती गई। ऐसे में, इस प्रकार का शपथग्रहण केवल एक सांस्कृतिक संकेत नही...