मध्य पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध के भंवर में खड़ा है। इजराइल और ईरान के बीच वर्षों से चल रहा परोक्ष संघर्ष अब प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में बदल चुका है। 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के संयुक्त अभियान से ईरान में बहुत नुकसान हो चुका है। इस सैन्य संघर्ष के पहले दिन ही ईरानी सर्वोच्च नेता खामेनेई मारे गए। ऐसे समय में भारत की संयमित प्रतिक्रिया को लेकर देश के भीतर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। विपक्ष का मत है कि खामेनेई की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए भारत को ईरान के साथ स्पष्ट रूप से खड़ा होना चाहिए जबकि भारत सरकार ने इस पूरी घटना पर कोई बयान नहीं दिया है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि क्या यह चुप्पी है या परिपक्व कूटनीतिक रणनीति ? मध्य पश्चिम एशिया में इजराइल और ईरान के बीच तनाव दशकों पुराना है , जिसकी जड़ें क्षेत्रीय सुरक्षा , वैचारिक टकराव और परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी आशंकाओं में निहित हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर इजराइल और अमेरिका लंबे समय से गंभीर आशंकाएँ व्यक्त करते रहे हैं। अक्टूबर 2023 में इजराइल पर हमास के हमले और उसके बाद गाजा पट्टी में इस्राइली सैन्य अभियान ने क्षेत्रीय समी...
केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू की ओर से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस आशय का पत्र लिखा जाना देश का ध्यान खींचने वाला है कि उसके कोलेजियम में सरकार के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए। उनका सुझाव है कि जैसे सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम में केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए , वैसे ही हाई कोर्ट कोलेजियम में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों को। पता नहीं उनके पत्र पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की क्या प्रतिक्रिया होगी , लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था न तो संविधानसम्मत है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल। न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था में इसलिए संशोधन - परिवर्तन किया जाना चाहिए , क्योंकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज करते समय स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता रेखांकित की थी। देश नहीं जानता कि इस दिशा में कोई प्रगत...