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बंगाल चुनाव के बाद बदलता राजनीतिक विमर्श

बंगाल चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश के साथ भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने से देश की राजनीति में अभूतपूर्व परिवर्तन तय है। यह चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति को देखने की नई दृष्टि देता है, साथ ही भारतीय मतदाताओं की बदलती राजनीतिक चेतना को समझने का नया दृष्टिकोण भी प्रदान करता है। यह चुनाव पारंपरिक ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसे मुद्दों से आगे बढ़कर स्पष्ट वैचारिक मुद्दों पर लड़ा गया। इस चुनाव ने लंबे समय से प्रभावी अल्पसंख्यक-केंद्रित चुनावी रणनीति को चुनौती दी जिसमें एकमुश्त अल्पसंख्यक वोट और बंटे हुए हिन्दू मतदाताओं के एक वर्ग को साथ लेकर सरकार बनाना सरल तरीका माना जाता था। यदि बंगाल की चुनावी राजनीति को देखें, तो इसकी शुरुआत 1952 के पहले विधानसभा चुनाव से होती है जब बिधान चंद्र राय के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 150 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया और वामपंथ मुख्य विपक्ष के रूप में उभरा। 1960 के दशक के अंत तक कांग्रेस का प्रभुत्व कमजोर होने लगा और 1967-69 में अस्थिर गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, जिसके बाद 1977 में वाम मोर्चा ने सत्ता संभाली और लगातार 34 वर्षों तक शासन किया,...
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परमाणु ऊर्जा में भारत की बड़ी उपलब्धि

परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में भारत ने एक निर्णायक उपलब्धि हासिल की है जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ट्वीट से की। यह उपलब्धि क्लपक्कम स्थित स्वदेशी प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के उस स्थिति तक पहुँच जाने से जुड़ी है जब रिएक्टर स्वयं-संचालित परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया शुरू कर देता है। इस तकनीक की खासियत यह है कि यह केवल ऊर्जा उत्पन्न नहीं करती, बल्कि जितना ईंधन उपयोग करती है उससे अधिक नया ईंधन (प्लूटोनियम) भी तैयार करती है। इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक संस्थागत छलांग के रूप में समझा जा सकता है जहाँ राज्य अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा आवश्यकताओं को बाहरी निर्भरता के बिना सुनिश्चित करने की क्षमता विकसित करता है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि भारत के ऊर्जा-आधारित रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक निर्णायक कदम है। परमाणु ऊर्जा बहुत आसान तरीके से समझें तो परमाणु के टूटने से बनने वाली ऊर्जा है। जब यूरेनियम जैसे तत्व के छोटे-छोटे कण (नाभिक) पर न्यूट्रॉन डाला जाता है, तो वह टूट जाता है और बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करता है। इस गर्मी से भाप बनाई जाती है, और यही भाप टर्बाइन ...

नेपाल की करवट लेती राजनीति और हिन्दू विमर्श

राम नवमी के पावन अवसर पर जब 108 ब्राह्मण बटुकों के स्वस्ति-वाचन, सात शंखनादों की गूंज और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अष्टमंगल पाठ के बीच बलेन्द्र शाह ने नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक औपचारिक राजनीतिक घटना नहीं रही बल्कि इसने नेपाल की स्थापित राजनीतिक परंपराओं और धारणाओं को बदल दिया। वैदिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रतीकों से परिपूर्ण इस शपथग्रहण ने हिन्दू राजनीति के उस विमर्श को पुनर्जीवित कर दिया, जो लंबे समय से नेपाल की राजनीति के हाशिये पर चला गया था। यह दृश्य बताता है कि नेपाल एक बार फिर अपनी राजनीतिक संरचना में हिन्दू मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है। यह घटनाक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि 2006 के बाद नेपाल के संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में पुनर्परिभाषित होने  और धर्मनिरपेक्षता को शासन का अभिन्न तत्व बनाकर वामपंथी दलों के प्रभुत्व ने एक ऐसी राजनीतिक छवि निर्मित की, जिसमें हिन्दू प्रतीकों और वैदिक परंपराओं की भूमिका सीमित होती गई। ऐसे में, इस प्रकार का शपथग्रहण केवल एक सांस्कृतिक संकेत नही...

ईरान संकट और भारत की ‘चुप्पी’ का कूटनीतिक अर्थ

मध्य पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध के भंवर में खड़ा है। इजराइल और ईरान के बीच वर्षों से चल रहा परोक्ष संघर्ष अब प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में बदल चुका है। 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के संयुक्त अभियान से ईरान में बहुत नुकसान हो चुका है। इस सैन्य संघर्ष के पहले दिन ही ईरानी सर्वोच्च नेता खामेनेई मारे गए। ऐसे समय में भारत की संयमित प्रतिक्रिया को लेकर देश के भीतर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। विपक्ष का मत है कि खामेनेई की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए भारत को ईरान के साथ स्पष्ट रूप से खड़ा होना चाहिए जबकि भारत सरकार ने इस पूरी घटना पर कोई बयान नहीं दिया है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि क्या यह चुप्पी है या परिपक्व कूटनीतिक रणनीति ? मध्य पश्चिम एशिया में इजराइल और ईरान के बीच तनाव दशकों पुराना है , जिसकी जड़ें क्षेत्रीय सुरक्षा , वैचारिक टकराव और परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी आशंकाओं में निहित हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर इजराइल और अमेरिका लंबे समय से गंभीर आशंकाएँ व्यक्त करते रहे हैं। अक्टूबर 2023 में इजराइल पर हमास के हमले और उसके बाद गाजा पट्टी में इस्राइली सैन्य अभियान ने क्षेत्रीय समी...

भारतीय न्यायपालिका एवं कोलेजियम व्यवस्था - विश्लेष्ण

केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू की ओर से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस आशय का पत्र लिखा जाना देश का ध्यान खींचने वाला है कि उसके कोलेजियम में सरकार के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए। उनका सुझाव है कि जैसे सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम में केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए , वैसे ही हाई कोर्ट कोलेजियम में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों को। पता नहीं उनके पत्र पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की क्या प्रतिक्रिया होगी , लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था न तो संविधानसम्मत है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल। न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था में इसलिए संशोधन - परिवर्तन किया जाना चाहिए , क्योंकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज करते समय स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता रेखांकित की थी। देश नहीं जानता कि इस दिशा में कोई प्रगत...