वर्तमान वैश्विक परिदृश्य युद्ध की विभीषिका और सैन्य संघर्षों के काले बादलों से घिरा हुआ है। एक ओर जहाँ मध्य पश्चिम में इज़राइल और गाजा का संघर्ष अपने वीभत्स और अमानवीय रूप में सामने है, वहीं दूसरी ओर रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता को झकझोर कर रख दिया है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब और लाल सागर के व्यापारिक मार्गों पर किए जा रहे हमलों ने नई सामरिक चिंताओं को जन्म दिया है, तो वहीं पाक-अफगान सीमाओं पर जारी तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की सुलगती लपटें भले ही कुछ शांत दिखाई दे रही हों लेकिन वैश्विक शांति पर मंडराता इनका खतरा आज भी कायम है। दुनिया के तमाम देश इन संघर्षों के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारी आर्थिक और कूटनीतिक क्षति झेल रहे हैं, जिससे इन्हें थामने के प्रयास तो हो रहे हैं किंतु इस पूरे कोलाहल में जिस सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी विषय को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, वह है मानवाधिकार । मानवाधिकारों का मूल दर्शन इसी विचार पर टिका है कि ये वे बुनियादी अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को केवल...
‘वंदे मातरम्’ केवल भारत का राष्ट्रगीत नहीं है। यह आधुनिक भारत के इतिहास का ऐसा सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीक है, जिसमें स्वतंत्रता, आत्मसम्मान, मातृभूमि और सभ्यतागत चेतना - चारों एक साथ दिखाई देते हैं। आज जब वंदे मातरम् अपनी रचना के 150 वर्ष पूरे कर चुका है, तब इसके इतिहास को केवल एक गीत के रूप में नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना के विकास की यात्रा के रूप में समझने की आवश्यकता है। यह वह गीत है जिसने औपनिवेशिक शासन के सामने भारतीयों के आत्मविश्वास को स्वर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन की अनेक पीढ़ियों को प्रेरित किया। 2025 में इसके 150 वर्ष पूरे होने पर भारत सरकार ने वर्षभर चलने वाले राष्ट्रीय स्मरणोत्सव की शुरुआत की, जिसमें इसके पूर्ण स्वरूप के सामूहिक गायन का भी आह्वान किया गया। वंदे मातरम् केवल भारत का राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि अविभाजित भारत के आधुनिक इतिहास का सबसे शक्तिशाली और वैचारिक रूप से संवेदनशील प्रतीक है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्मा यह गीत ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ प्रतिरोध की सबसे बुलंद आवाज बना और क्रांतिकारियों के लिए मूलमंत्र बन गया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 ...