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नेपाल की करवट लेती राजनीति और हिन्दू विमर्श


राम नवमी के पावन अवसर पर जब 108 ब्राह्मण बटुकों के स्वस्ति-वाचन, सात शंखनादों की गूंज और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अष्टमंगल पाठ के बीच बलेन्द्र शाह ने नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक औपचारिक राजनीतिक घटना नहीं रही बल्कि इसने नेपाल की स्थापित राजनीतिक परंपराओं और धारणाओं को बदल दिया। वैदिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रतीकों से परिपूर्ण इस शपथग्रहण ने हिन्दू राजनीति के उस विमर्श को पुनर्जीवित कर दिया, जो लंबे समय से नेपाल की राजनीति के हाशिये पर चला गया था। यह दृश्य बताता है कि नेपाल एक बार फिर अपनी राजनीतिक संरचना में हिन्दू मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है।

यह घटनाक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि 2006 के बाद नेपाल के संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में पुनर्परिभाषित होने  और धर्मनिरपेक्षता को शासन का अभिन्न तत्व बनाकर वामपंथी दलों के प्रभुत्व ने एक ऐसी राजनीतिक छवि निर्मित की, जिसमें हिन्दू प्रतीकों और वैदिक परंपराओं की भूमिका सीमित होती गई। ऐसे में, इस प्रकार का शपथग्रहण केवल एक सांस्कृतिक संकेत नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं की ओर इशारा करता है। अतः इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए नेपाल के राजनीतिक इतिहास और उसके वैचारिक उतार-चढ़ाव का गहन विश्लेषण आवश्यक हो जाता है।

नेपाल की ऐतिहासिक राजनीतिक पृष्ठभूमि

नेपाल में 1768 में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा नेपाल के एकीकरण के साथ आधुनिक राजशाही की स्थापना हुई। इस समय शासन पूरी तरह राजतांत्रिक था, जहाँ राजा सर्वोच्च सत्ता के केंद्र थे और जनता की राजनीतिक भागीदारी नगण्य थी। यह व्यवस्था लंबे समय तक चली, विशेषकर 1846 से 1951 तक के राणा शासन के दौरान, जहाँ वास्तविक सत्ता राणा प्रधानमंत्रियों के पास थी जबकि राजा केवल प्रतीकात्मक भूमिका में थे। राजशाही और निर्वाचित सरकार के सह-अस्तित्व की शुरुआत 1951 में हुई, जब राणा शासन के अंत के बाद लोकतांत्रिक प्रयोग प्रारंभ हुआ। इस दौर में पहली बार नेपाल में राजनीतिक दलों को मान्यता मिली और निर्वाचित सरकार की अवधारणा सामने आई। हालांकि, यह प्रयोग स्थिर नहीं रह सका। 1960 में राजा महेन्द्र ने लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर ‘पंचायत प्रणाली’ लागू की, जिसमें दल-विहीन व्यवस्था के तहत सत्ता पुनः राजा के हाथों में केंद्रीकृत हो गई। इस प्रकार निर्वाचित सरकार की भूमिका सीमित हो गई और राजशाही पुनः प्रमुख शक्ति बन गई। 1990 का जनआंदोलन इस संबंध में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसके परिणामस्वरूप नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई, जहाँ राजा राष्ट्राध्यक्ष बने रहे, लेकिन वास्तविक कार्यपालिका शक्ति निर्वाचित सरकार के पास आ गई। 1990 के संविधान ने बहुदलीय लोकतंत्र को मान्यता दी और पहली बार स्पष्ट रूप से राजा और निर्वाचित सरकार के बीच शक्ति-विभाजन को परिभाषित किया। इस दौर में दोनों के बीच एक संतुलन स्थापित करने का प्रयास हुआ, लेकिन समय-समय पर तनाव भी उत्पन्न होते रहे, विशेषकर तब जब राजशाही ने राजनीतिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप किया।

2005 में राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा प्रत्यक्ष शासन संभालने के निर्णय ने इस संबंध को गंभीर संकट में डाल दिया। इसके खिलाफ व्यापक जनआंदोलन हुआ, जिसे 2006 का जनआंदोलन कहा जाता है। इस आंदोलन ने राजशाही की शक्ति को समाप्त कर दिया और अंततः 2008 में नेपाल को पूर्ण गणराज्य घोषित किया गया। इसके साथ ही राजशाही का अंत हो गया और निर्वाचित सरकार ही संप्रभु सत्ता का केंद्र बन गई। इन पूरे घटनाक्रम में भले ही राजतंत्र और लोकतंत्र के टकराव की प्रतिध्वनि सुनाई देती हो, किंतु एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी उभरकर सामने आता है कि वामपंथी विचारधारा के आगमन के साथ नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा का एक नया दौर प्रारंभ हुआ। माओवादी संगठनों विशेषकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) ने सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से राज्य सत्ता को चुनौती दी और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के प्रश्न को आधार बनाकर हिंसात्मक संघर्ष का मार्ग अपनाया। इस संघर्ष ने न केवल राज्य व्यवस्था को झकझोरा, बल्कि समाज के भीतर भी गहरे विभाजन उत्पन्न किए।

वामपंथी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि गणराज्य की स्थापना के साथ ही धर्मनिरपेक्षता को संविधान का अभिन्न अंग बना दिया गया। सिद्धांततः यह व्यवस्था समावेशिता और समानता पर आधारित थी, परंतु व्यवहार में इसके माध्यम से हिन्दू पहचान को सार्वजनिक जीवन में सीमित करने की प्रवृत्ति देखने को मिली। हिन्दू एकजुटता को कमजोर करने के लिए क्षेत्रीय, जातीय और पहचान आधारित राजनीति को बढ़ावा मिला, जिससे समाज की पारंपरिक सांस्कृतिक एकता प्रभावित हुई।

सांस्कृतिक राष्ट्रों के लिए उनकी सामाजिक चेतना सबसे बड़ा आधार होती है। हजारों वर्षों से सतत चली आ रही संस्कृति उनके सिद्धांतों को इतना प्रासंगिक बना देती है कि वो काल गति के सामने भी चट्टान की तरह खड़े रहें। विशेषकर हिन्दू संस्कृति में – जहां अनगिनत सिद्धांतों का निर्माण किया गया जिनका अंतिम लक्ष्य सभी के हित से जुड़ा है। इस व्यवस्था नें समाज को उस समय भी मार्ग दिखाया जब राजनीतिक नेतृत्व विफल रहा। यूरोपियन मॉडल में भले ही देश की पहचान वहाँ के वैध शासन से हो, लेकिन पूर्वी संस्कृति समाज केंद्रित व्यवस्था को ज्यादा महत्व देती है। हिन्दू संस्कृति में धर्म का सिद्धांत वह रीढ़ है जिसने हमारे समाज को अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कमजोर नहीं होने दिया। 

वामपंथी राजनीति और धर्मनिरपेक्षता

जब कोई सत्ता या विचार अपने अनुसार समाज को चलाने और अपनी सोच अनुसार समाज को ढालने का प्रयास करता है तो उसका पहला वार समाज की उसी रीढ़ पर होता है। यही कारण है कि वामपंथी विचारों नें भारत या हिन्दू देशों में अपने फैलाव के शुरुआती समय में पहला प्रहार संस्कृति पर किया। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सांस्कृतिक चेतना को शून्य कर देने के ये प्रयास जब जब सफल हुए तब तब देश के सामने गंभीर समस्याओं का अंबार लग गया। भारत और नेपाल में यही हुआ। एक तरफ भारत में अनेक दशकों तक छद्म धर्मनिरपेक्ष की बातें कर व अपने हित अनुसार परिभाषित कर धर्म विहीन राजनीति की परिकल्पना की गई तो वहीं सशस्त्र अभियान चला नेपाल की राजनीति में धर्म को शून्य कर देने के प्रयास हुए। नेपाल में वामपंथी दलों विशेषकर माओवादी और अन्य कम्युनिस्ट समूहों ने धर्मनिरपेक्षता को सामाजिक न्याय और आधुनिकता के साथ तथा पारंपरिक हिन्दू व्यवस्था को प्रायः जाति-आधारित असमानता और रूढ़िवादिता से जोड़ा। योजनागत तरीके से हिन्दू भावनाओं की उपेक्षा कर धार्मिक प्रतीकों और वैदिक परंपराओं को महत्वहीन सिद्ध करने का कार्य हुआ।  

इसका एक प्रभाव नेपाल की विदेश नीति में स्पष्ट देखने को मिला जब वामपंथी विचारों के नेतृत्व में चीनी एजेंडे को महत्व दिया जाने लगा। भारत विरोधी स्वरों को बढ़ावा मिला और चीन का नेपाल में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप देखने को मिला। 

2025 की क्रांति और नई राजनीति

धर्म से विमुख राजनीति में जब सत्ता नैतिक-सांस्कृतिक मूल्यों से कट जाती है, तो उसमें उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता कम होने लगती है। इसी कारण नेपाल में सामाजिक और आर्थिक सुधारों के नाम पर स्थापित व्यवस्था अपेक्षित परिणाम देने में विफल रही और भ्रष्टाचार, अस्थिरता तथा प्रशासनिक अक्षमता जैसी समस्याएँ उभरकर सामने आईं। परिणामस्वरूप, उपेक्षा का शिकार हिन्दू वर्ग समस्याओं के समाधान खोजने लगा तथा समाज में अपनी सांस्कृतिक पहचान के पुनर्स्थापन की मांग तेज होने लगी।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच 2025 का जनआंदोलन एक निर्णायक मोड़ बनकर उभरा। लंबे समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता, बार-बार बदलती सरकारें, बढ़ता भ्रष्टाचार, आर्थिक ठहराव और जनता में गहराता असंतोष इस आंदोलन की पृष्ठभूमि बने। धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था और वामपंथी दलों के प्रभुत्व के बीच एक बड़े वर्ग में यह भावना विकसित हो रही थी कि राज्य उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा। इन परिस्थितियों में युवाओं, नागरिक समूहों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने सड़कों पर उतरकर व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू किए, जो धीरे-धीरे राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदल गए। जनता का सड़क पर उतरना, सत्ता को उखाड़ फेंकना और अंतरिम सरकार के हाथों में नेपाल का जाना, इन परिस्थितियों ने राजनीति में नए चेहरों के आने को तय कर दिया। अब चुनाव पश्चात जब बलेन्द्र शाह प्रधानमंत्री बने हैं तो नेपाल एक ऐसे संक्रमणकाल में प्रवेश करता दिखाई देता है जहाँ हिन्दू मूल्यों, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक संरचना के बीच संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है।


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