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भारतीय न्यायपालिका एवं कोलेजियम व्यवस्था - विश्लेष्ण


केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू की ओर से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस आशय का पत्र लिखा जाना देश का ध्यान खींचने वाला है कि उसके कोलेजियम में सरकार के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए। उनका सुझाव है कि जैसे सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम में केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए, वैसे ही हाई कोर्ट कोलेजियम में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों को। पता नहीं उनके पत्र पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की क्या प्रतिक्रिया होगी, लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था तो संविधानसम्मत है और ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल।

न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था में इसलिए संशोधन-परिवर्तन किया जाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज करते समय स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता रेखांकित की थी। देश नहीं जानता कि इस दिशा में कोई प्रगति क्यों नहीं हुई? कोलेजियम व्यवस्था का निर्माण संविधान ने नहीं किया। इसका निर्माण स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने किया और ऐसा करके न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण का अधिकार पूरी तौर पर अपने हाथ में ले लिया। ऐसा विश्व के किसी प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक देश-और यहां तक कि ब्रिटेन और अमेरिका में भी नहीं होता। आखिर जब किसी देश में न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करते तो भारत में ऐसा क्यों होना चाहिए? यह वह प्रश्न है, जिसका कोई स्पष्ट उत्तर देने के स्थान पर इस तरह के खोखले तर्क दिए जाते हैं कि यह धारणा गलत है कि भारत में न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। ऐसे तर्क देकर सच से मुंह मोड़ने की कोशिश ही की जाती है।

समस्या केवल यह नहीं है कि कोलेजियम व्यवस्था संविधान की भावना के प्रतिकूल है। समस्या यह भी है कि यह अपारदर्शी है। इसमें जवाबदेही का भी अभाव है। कोलेजियम में शामिल न्यायाधीशों के अलावा अन्य किसी को नहीं पता चलता कि किसी न्यायाधीश की नियुक्ति या प्रोन्नति क्यों की गई? इससे भी विचित्र यह है कि कोलेजियम के निर्णयों की प्रक्रिया का विवरण देने से भी मना कर दिया जाता है। वास्तव में इसी कारण कोलेजियम व्यवस्था का विरोध होता रहा है। यह आगे भी होता रहेगा, क्योंकि यह व्यवस्था लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन करती है।

इसका कोई औचित्य नहीं कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों में कार्यपालिका की कहीं कोई भूमिका ही हो। यह समझ आता है कि सुप्रीम कोर्ट यह अपेक्षा रखे कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों में कार्यपालिका ही पूरी तौर पर प्रभावी हो, लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि उसकी कहीं कोई भूमिका हो। फिलहाल न्यायाधीशों की नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका पोस्टमास्टर जैसी है। स्पष्ट है कि यह स्थिति ठीक नहीं और इसमें परिवर्तन होना ही चाहिए।


COLLEGIUM SYSTEM - sc of india

भारतीय मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने हाल ही में दो जजों के नाम की संस्तुति की है और सरकार द्वारा दिए गये दो जजों की पदोन्नति से सम्बंधित प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

सरकार ने कॉलेजियम को यह सुझाव दिया था कि झारखंड उच्च न्यायालय और गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अनिरुद्ध बोस और ए।एस। बोपन्ना को सर्वोच्च न्यायालय का जज बनाने से सम्बंधित कॉलेजियम के प्रस्ताव पर फिर से विचार किया जाए। किन्तु कॉलेजियम ने सरकार का यह सुझाव नहीं माना। कॉलेजियम का कहना था कि उसने इन दोनों जजों के नाम बहुत सोच-विचार के भेजे थे। इन दोनों जजों के आचरण, क्षमता अथवा ईमानदारी के विषय में कोई प्रतिकूल सूचना नहीं है।

कॉलेजियम व्यवस्था क्या है?

उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया के सम्बन्ध में संविधान में कोई व्यवस्था नहीं दी गई है।

अतः यह कार्य शुरू में सरकार द्वारा ही अपने विवेक से किया जाया करता था।

परन्तु 1990 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करना शुरू किया और एक के बाद एक कानूनी व्यवस्थाएँ दीं। इन व्यवस्थाओं के आलोक में धीरे-धीरे नियुक्ति की एक नई व्यवस्था उभर के सामने आई। इसके अंतर्गत जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की अवधारणा सामने आई।

  • सर्वोच्च न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा वरिष्ठतम न्यायाधीश कॉलेजियम के सदस्य होते हैं।
  • ये कॉलेजियम ही उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति के लिए नाम चुनती है और फिर अपनी अनुशंसा सरकार को भेजती है।
  • सरकार इन नामों से ही न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए कार्रवाई करती है।
  • कॉलेजियम की अनुशंसा राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है। यदि राष्ट्रपति किसी अनुशंसा को निरस्त करते हैं तो वह वापस कॉलेजियम के पास लौट जाती है। परन्तु यदि कॉलेजियम अपनी अनुशंसा को दुहराते हुए उसे फिर से राष्ट्रपति को भेज देती है तो राष्ट्रपति को उस अनुशंसा को मानना पड़ता है।
  • कॉलेजियम अपनी ओर से वकीलों और जजों के नामों की केन्द्रीय सरकार को अनुशंसा भेजता है। इसी प्रकार केंद्र सरकार भी अपनी ओर से कॉलेजियम को कुछ नाम प्रस्तावित करती है।
  • कॉलेजियम द्वारा भेजे गये नामों की केंद्र सरकार तथ्यात्मक जाँच करती है और फिर सम्बंधित फाइल को कॉलेजियम को लौटा देती है।
  • तत्पश्चात् कॉलेजियम केंद्र सरकार द्वारा भेजे गये नाम और सुझावों पर विचार करता है और फिर फाइल को अंतिम अनुमोदन के लिए सरकार को फिर से भेज देता है। जब कॉलेजियम फिर से उसी नाम को दुबारा भेजता है तो सरकार को उस नाम पर अनुमोदन देना पड़ता है। किन्तु सरकार कब अब अपना अनुमोदन देगी इसके लिए कोई समय-सीमा नहीं है। यही कारण है कि जजों की नियुक्ति में लम्बा समय लग जाता है।

कॉलेजियम व्यवस्था को बदलने के प्रयास

कॉलेजियम व्यवस्था कई कारणों से आलोचना का केंद्र रही है। इसलिए सरकार चाहती है कि इसे हटाकर एक ऐसी प्रणाली बनाई जाए जिसमें कॉलेजियम व्यवस्था की तरह निरंकुशता और अपारदर्शिता हो। इस संदर्भ में संसद ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना से सम्बंधित एक कानून पारित किया था परन्तु 16 अक्टूबर, 2015 को सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत इस प्रस्ताव को निरस्त करते हुए कहा था कि यह असंवैधानिक है और यह न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को चोट पहुँचेगी। न्यायालय का कहना था कि प्रस्तावित संशोधनों के कारण न्यायपालिका की स्वतंत्रता को क्षति पहुँचेगी तथा न्यायिक नियुक्तियों को कार्यपालिका के नियंत्रण से दूर रखना चाहिए।

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