बंगाल चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश के साथ भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने से देश की राजनीति में अभूतपूर्व परिवर्तन तय है। यह चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति को देखने की नई दृष्टि देता है, साथ ही भारतीय मतदाताओं की बदलती राजनीतिक चेतना को समझने का नया दृष्टिकोण भी प्रदान करता है। यह चुनाव पारंपरिक ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसे मुद्दों से आगे बढ़कर स्पष्ट वैचारिक मुद्दों पर लड़ा गया। इस चुनाव ने लंबे समय से प्रभावी अल्पसंख्यक-केंद्रित चुनावी रणनीति को चुनौती दी जिसमें एकमुश्त अल्पसंख्यक वोट और बंटे हुए हिन्दू मतदाताओं के एक वर्ग को साथ लेकर सरकार बनाना सरल तरीका माना जाता था।
यदि बंगाल की चुनावी राजनीति को देखें, तो इसकी शुरुआत 1952 के पहले विधानसभा चुनाव से होती है जब बिधान चंद्र राय के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 150 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया और वामपंथ मुख्य विपक्ष के रूप में उभरा। 1960 के दशक के अंत तक कांग्रेस का प्रभुत्व कमजोर होने लगा और 1967-69 में अस्थिर गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, जिसके बाद 1977 में वाम मोर्चा ने सत्ता संभाली और लगातार 34 वर्षों तक शासन किया, यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे लंबा निर्वाचित शासन रहा। 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने वाम शासन का अंत करते हुए भारी बहुमत से जीत दर्ज की, जो बंगाल की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था। 2016 में तृणमूल कांग्रेस ने 211 सीटें जीतकर अपनी स्थिति और मजबूत की, जबकि 2021 के चुनाव में भी उसने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और भारतीय जनता पार्टी 77 सीटों के साथ प्रमुख विपक्ष बनकर उभरी। 2026 के चुनाव में परिस्थिति पूरी तरह बदल गई और भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। इन चुनावों में भाजपा ने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के विरुद्ध हिन्दुत्व आधारित सामाजिक और राजनीतिक एकीकरण (Political Integration) का मॉडल प्रस्तुत करते हुए नए चुनावी समीकरण स्थापित किए। ये चुनाव परिणाम संकेत करते हैं कि हिन्दुत्व को उसकी पारंपरिक संकुचित परिभाषाओं से बाहर निकालकर नए राजनीतिक संदर्भ में समझे जाने की आवश्यकता है।
भारत में लंबे समय तक अल्पसंख्यक राजनीति, विशेषकर मुस्लिम वोट बैंक राजनीति (Vote Bank Politics), राजनीतिक पार्टियों के लिए आदर्श स्थिति थी। राजनीति विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में भारतीय चुनावी राजनीति को लंबे समय तक ऐसी संरचना के रूप में देखा गया, जहाँ अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं का राजनीतिक एकीकरण स्वाभाविक माना जाता था, जबकि हिन्दू समाज को दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और सवर्ण जैसी अनेक सामाजिक श्रेणियों में विभाजित रखकर चुनावी रणनीति निर्मित की जाती थी। अनेक राजनीतिक वैज्ञानिकों ने इस प्रवृत्ति को वोट बैंक राजनीति (Vote Bank Politics), सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering), ‘मंडल बनाम कमंडल’, बहुसंख्यक विखंडन (Majority Fragmentation) तथा अल्पसंख्यक समेकन (Minority Consolidation) जैसे सिद्धांतों और शब्दों के माध्यम से व्याख्यायित किया। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि भारतीय लोकतंत्र में बहुसंख्यक हिन्दू समाज एक राजनीतिक इकाई के रूप में संगठित नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी आंतरिक जातीय विविधताएँ उसे स्थायी रूप से विभाजित रखती हैं। इसके विपरीत अल्पसंख्यक राजनीति अपेक्षाकृत अधिक संगठित और रणनीतिक मानी जाती रही। किंतु भाजपा ने इस स्थापित चुनावी विमर्श को न केवल चुनौती दी बल्कि हिन्दुत्व के सांस्कृतिक और सभ्यतागत विमर्श के माध्यम से हिन्दू पहचान को जातीय सीमाओं से ऊपर उठाने में सफलता प्राप्त की। भाजपा ने मुस्लिम राजनीति को अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के रूप में परिभाषित करते हुए हिन्दू मतदाताओं के एकीकरण से इसका जवाब दिया। बहुसंख्यक राजनीतिक समेकन (Majoritarian Political Consolidation) की यह विशिष्ट रणनीति विश्व राजनीति में अपेक्षाकृत दुर्लभ मानी जा सकती है। राजनीति विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को सभ्यतागत-सांस्कृतिक पहचान निर्माण (Cultural Identity Formation) कहा जा सकता है। इसका अर्थ वह स्थिति है जब किसी देश का बहुसंख्यक समुदाय अपनी आंतरिक जातीय, क्षेत्रीय, भाषाई अथवा वर्गीय विभाजनों से ऊपर उठकर स्वयं को एक साझा राजनीतिक और सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखने लगता है। सामान्यतः आधुनिक लोकतंत्रों में बहुसंख्यक समाज अत्यधिक विविध होने के कारण स्थायी रूप से विभाजित रहता है, जबकि अल्पसंख्यक समुदाय सुरक्षा, पहचान और प्रतिनिधित्व की राजनीति के कारण अधिक संगठित मतदान व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इसी कारण राजनीतिक विज्ञान में ‘अल्पसंख्यक एकजुटता बनाम बहुसंख्यक विखंडन’ का सिद्धांत लंबे समय तक प्रभावी रहा, जिसके अनुसार बहुसंख्यक समाज को जाति, वर्ग, नस्ल, क्षेत्र या आर्थिक हितों के आधार पर विभाजित रखना लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक परिणाम माना जाता था।
भाजपा की हिन्दुत्व राजनीति ने बंगाल में सभी जातीय, वर्गीय और अन्य सामाजिक भेदों की दीवारों को गिरा दिया तथा एक विशेष वर्ग की पार्टी के रूप में देखे जाने वाली छवि को भी चुनौती दी। हिन्दू वोटों का एकीकरण कोई सामान्य या आसान प्रक्रिया नहीं है। भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों की तुलना में अधिक जटिल मानी जाती है लेकिन हिन्दुत्व इन विविधताओं के बीच एक व्यापक सांस्कृतिक एकीकरण के सूत्र के रूप में उभरता दिखाई देता है। अब तक अनेक राजनीतिक वैज्ञानिकों ने हिन्दुत्व को संकुचित राजनीतिक परिभाषाओं तक सीमित रखा। इस संकुचित परिभाषा ने ही हिन्दू समाज को स्थायी रूप से विभाजित सामाजिक समूहों के रूप में देखा और हिन्दुत्व को केवल उच्च वर्ग के लोगों के राजनीतिक उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया जबकि भाजपा की लगातार चुनावी सफलताएँ इन स्थापित सिद्धांतों को चुनौती देती दिखाई देती हैं। बंगाल चुनाव परिणाम दर्शाते हैं कि भाजपा ने खास वर्ग तक स्वयं को सीमित नहीं रखा बल्कि उसने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) तथा अन्य सामाजिक समूहों को एक व्यापक हिन्दू राजनीतिक पहचान के अंतर्गत संगठित करने में सफलता प्राप्त की है। आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने 68 में से 48 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों पर विजय प्राप्त की, जबकि सभी 16 अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों पर विजय प्राप्त की। यह राज्य की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में एक गहरे परिवर्तन का संकेत है। नदिया और उत्तर चौबीस परगना के मतुआ बहुल क्षेत्रों से लेकर जंगलमहल और उत्तर बंगाल के आदिवासी इलाकों तक भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सामाजिक और राजनीतिक एकीकरण के माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया। इससे प्रतीत होता है कि हिन्दुत्व अब हिन्दू समाज की विभिन्न जातीय और सामाजिक परतों को जोड़ने वाला एक व्यापक राजनीतिक ढांचा बन चुका है। हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों के राजनीतिक एकीकरण से एक व्यापक हिन्दू राजनीतिक समेकन उभरता दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल में एससी, एसटी, ओबीसी और सवर्ण समुदायों के बीच भाजपा को प्राप्त व्यापक समर्थन यह संकेत देता है कि भारतीय राजनीति में बहुसंख्यक एकीकरण को एक संगठित राजनीतिक शक्ति में रूपांतरित किया गया है। इस परिवर्तन ने भारतीय चुनावी राजनीति के उस पारंपरिक मॉडल को उलट दिया है, जिसमें बहुसंख्यक को विभाजित और अल्पसंख्यक समुदायों को अपेक्षाकृत अधिक संगठित मानकर राजनीतिक रणनीतियाँ निर्मित की जाती थीं।
हिन्दुत्व और सामाजिक समावेशन
राजनीतिक विश्लेषक हिन्दू राजनीतिक एकीकरण को स्वीकार कर रहे हैं लेकिन इसे मुस्लिम-विरोधी राजनीतिक परियोजना के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है जबकि भाजपा की रणनीति अलग संकेत देती है। भाजपा की राजनीति मुस्लिम वोट बैंक और पहचान-आधारित राजनीति (Identity Politics) की आलोचना करती रही है लेकिन सामाजिक स्तर पर हिन्दुत्व स्वयं को व्यापक सांस्कृतिक समावेशन के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। हिन्दुत्व को सिर्फ मुस्लिम तुष्टीकरण के प्रत्युत्तर के रूप में समझना अधूरा विश्लेषण होगा, क्योंकि उसकी वैचारिक संरचना में ‘सांस्कृतिक एकीकरण’ और ‘सामाजिक समावेशन’ (Social Inclusion) दोनों समानांतर रूप से कार्य करते हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ तथा ‘अंत्योदय’ जैसे नारों ने भाजपा को केवल बहुसंख्यक पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे कल्याणकारी राष्ट्रवाद (Welfare Nationalism) के मॉडल में परिवर्तित किया। सांस्कृतिक रूप से हिन्दुत्व आधारित एकीकृत पहचान और आर्थिक और कल्याणकारी समानता पर आधारित नीतियों ने भाजपा को व्यापक सामाजिक वैधता प्रदान की है जिसे राजनीति विज्ञान में ‘समावेशी बहुसंख्यकवाद’ (Inclusive Majoritarianism) की उभरती प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। हिन्दुत्व की वैचारिक अवधारणा, विशेषकर सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय तथा गोलवलकर के विचारों में, हिन्दू समाज को जातीय विभाजनों से ऊपर एक सांस्कृतिक-सभ्यतागत इकाई के रूप में देखने का प्रयास दिखाई देता है। साथ ही, दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवदर्शन’ और ‘अंत्योदय’ ने समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने को राष्ट्रवाद का नैतिक आधार बनाया। इसी कारण भाजपा की राजनीति केवल पहचान-आधारित विमर्श तक सीमित नहीं रही, बल्कि उज्ज्वला, आयुष्मान, जनधन, आवास, शौचालय, मुफ्त राशन और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी योजनाओं के माध्यम से वर्ग, जाति और क्षेत्र से ऊपर उठकर लाभार्थी-आधारित राजनीति (Beneficiary-based Politics) के रूप में भी दिखाई देती है। सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण और कल्याणकारी राजनीति के संयोजन की नई अवधारणा प्रस्तुत कर भाजपा ने ऐसी रणनीति का निर्माण किया है जिसका प्रभावी राजनीतिक प्रत्युत्तर विपक्ष अभी तक विकसित नहीं कर पाया है।

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