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वंदे मातरम विवाद नहीं चेतना का विषय




‘वंदे मातरम्’ केवल भारत का राष्ट्रगीत नहीं है। यह आधुनिक भारत के इतिहास का ऐसा सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीक है, जिसमें स्वतंत्रता, आत्मसम्मान, मातृभूमि और सभ्यतागत चेतना - चारों एक साथ दिखाई देते हैं। आज जब वंदे मातरम् अपनी रचना के 150 वर्ष पूरे कर चुका है, तब इसके इतिहास को केवल एक गीत के रूप में नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना के विकास की यात्रा के रूप में समझने की आवश्यकता है। यह वह गीत है जिसने औपनिवेशिक शासन के सामने भारतीयों के आत्मविश्वास को स्वर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन की अनेक पीढ़ियों को प्रेरित किया। 2025 में इसके 150 वर्ष पूरे होने पर भारत सरकार ने वर्षभर चलने वाले राष्ट्रीय स्मरणोत्सव की शुरुआत की, जिसमें इसके पूर्ण स्वरूप के सामूहिक गायन का भी आह्वान किया गया।



वंदे मातरम् केवल भारत का राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि अविभाजित भारत के आधुनिक इतिहास का सबसे शक्तिशाली और वैचारिक रूप से संवेदनशील प्रतीक है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्मा यह गीत ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ प्रतिरोध की सबसे बुलंद आवाज बना और क्रांतिकारियों के लिए मूलमंत्र बन गया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को संस्कृत व बंगाली भाषा के खूबसूरत मिश्रण में इस कालजयी गीत की रचना की। बंकिम चंद्र ने 1882 में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुए संन्यासी विद्रोह पर आधारित राजनीतिक-साहित्यिक उपन्यास आनंदमठ में इसको शामिल किया। आनंदमठ उन घटनाओं को बताता है, जब 18वीं शताब्दी में अकाल और ब्रिटिश समर्थित शासकों के अत्याचार से त्रस्त संन्यासी देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए गुप्त संगठन बनाते हैं। इस उपन्यास में यह गीत उनका दीक्षा-मंत्र और युद्धघोष बनकर उभरा। बंकिम चंद्र ने इस गीत से जो सांस्कृतिक बिंब तैयार किया, उसने तत्कालीन समाज में राष्ट्रवाद को धार्मिक पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान की।



इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें राष्ट्र को केवल एक भौगोलिक भूखंड के रूप में नहीं देखा गया। भारतभूमि यहाँ माता है - पूज्य, जीवनदायिनी और संरक्षण योग्य। यही भाव भारतीय सभ्यता की उस दीर्घ परंपरा से जुड़ता है, जिसमें भूमि के साथ संबंध केवल स्वामित्व का नहीं, बल्कि मातृत्व और कर्तव्य का है। इसीलिए वंदे मातरम् का उद्घोष केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की माँग नहीं था। वह भारतीय मन को यह स्मरण कराने वाला उद्घोष था कि जिस भूमि पर हम जन्म लेते हैं, उसके प्रति हमारा संबंध केवल नागरिकता का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और आत्मीयता का भी है।

आनंदमठ उपन्यास से सार्वजनिक पटल पर आने के बाद वंदे मातरम् तेजी से बंगाली बुद्धिजीवियों व राष्ट्रवादियों के बीच लोकप्रिय हुआ, लेकिन देशव्यापी पहचान और एक राजनीतिक आंदोलन का रूप 1905 के बंगाल विभाजन के समय मिला। कर्जन द्वारा सांप्रदायिक आधार पर बंगाल विभाजन के विरोध में पूरा देश उठ खड़ा हुआ। तब सड़कों पर निकलते विरोध मार्च में छात्रों, क्रांतिकारियों और आम नागरिकों के कंठ से निकलने वाली वंदे मातरम् की गूँज ने अंग्रेजों को विचलित कर दिया। कांग्रेस अधिवेशनों से भी वंदे मातरम् को राजनीतिक स्वीकार्यता मिली।

जब 1920 और 30 के दशक में मुस्लिम लीग मुस्लिमों के लिए अलग राजनीतिक पहचान की माँग कर रही थी, तब देश का माहौल धार्मिक उन्माद और सांप्रदायिकता से भर गया। मुस्लिम नेताओं ने वंदे मातरम् पर आपत्ति जताई। 1937 के चुनाव में जब अनेक प्रांतों में कांग्रेस सरकार बनी तो विधानसभाओं में चर्चा की शुरुआत वंदे मातरम् से होने लगी। मुस्लिम लीग हिन्दू संस्कृति और प्रतीकों को स्थापित होते हुए नहीं देखना चाहती थी। विवाद सिर्फ मुस्लिम लीग का नहीं था, बल्कि कांग्रेस के अनेक मुस्लिम नेता इस्लाम के सिद्धांतों का हवाला देकर वंदे मातरम् को लेकर असहज थे। 1923 में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रसिद्ध संगीतकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने मंच पर वंदे मातरम् शुरू किया तो मौलाना मोहम्मद अली ने संगीत को इस्लाम में हराम बताते हुए इसका विरोध किया। इस विरोध का मुख्य लक्ष्य भारत की सभ्यतागत चेतना पर इस्लामी कब्जा और ‘हिन्दू राज’ की संभावनाओं को दबाना था।

अक्टूबर 1937 में कोलकाता में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में वंदे मातरम् को लेकर एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक चर्चा हुई थी। मजहबी उन्माद के आगे झुकते हुए कांग्रेस ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंदों को आधिकारिक रूप से मान्यता दी। क्या किसी धार्मिक आपत्ति के कारण भारत की अपनी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को सार्वजनिक जीवन से लगातार संकुचित किया जाना उचित है? यह प्रश्न आज इसलिए अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि कांग्रेस ने फिर अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो छंदों के गायन की अपनी 1937 की परंपरा पर कायम रहने का निर्णय लिया है।

सर्वविदित है कि भारत ने अनेक इस्लामिक आक्रमण सहे और जो मुस्लिम राज भारत में स्थापित हुए, उनमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति और चेतना - तीनों पर प्रहार हुए। छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘स्वराज्य’ हो या स्वामी विवेकानंद का भव्य भारत का स्वप्न, सावरकर का ‘हिन्दू राष्ट्र’ या फिर तिलक व महात्मा गांधी का ‘स्वराज’, सभी चिंतकों के अनुसार भारत का मूल स्वरूप उसकी सांस्कृतिक विरासत के साथ है। सभी ने भारत की संस्कृति को संरक्षित करने और विदेशी विचारों से सुरक्षित रखने का आह्वान किया। वंदे मातरम् भारत भूमि की सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप मातृभूमि को माँ व देवी मानकर स्तुति करता है।

कांग्रेस मुस्लिमों के विरोध को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर होने से जोड़कर देख रही थी, जिस कारण तत्कालीन स्थितियों में इस गीत के पहले दो छंदों को ही आधिकारिक रूप से गाने का फैसला किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जब देश का विभाजन हो गया तथा इस्लामिक देश के रूप में पाकिस्तान का निर्माण हुआ, तो भारत सरकार को अपनी सांस्कृतिक पहचान और हिन्दू आस्था के साथ आगे बढ़ने के लिए संकल्पबद्ध होना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह हुआ कि भारी रक्तपात के साथ हुए विभाजन के बाद भी बहुसंख्यक हिन्दू अपने ही देश में फिर हाशिए पर चले गए। कांग्रेस ने वंदे मातरम् को कटे हुए रूप में भी अपनाया और आगे भी जारी रखा। यह प्रश्न उठाना लाजिमी है कि विभाजन के बाद भी सम्पूर्ण वंदे मातरम् को मान्यता न देने के पीछे क्या कारण रहे?

आज जब वंदे मातरम् अपने 150 वर्ष पूरे कर रहा है, तो सत्तारूढ़ भाजपा ने वंदे मातरम् के वास्तविक स्वरूप को राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता दी है। वर्तमान सरकार ने इसके पूर्ण स्वरूप के आधिकारिक गायन को नए सिरे से प्रोत्साहित किया है। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से वंदे मातरम् का पूरा स्वरूप गाया गया। एक तरफ भारत अतीत के काले अध्यायों को पीछे छोड़कर पुनः सभ्यतागत चेतना को प्राप्त करने को अग्रसर हुआ और गुलामी की मानसिकता से मुक्ति जैसे लक्ष्यों पर आगे बढ़ रहा है, तो वहीं कांग्रेस पार्टी द्वारा वंदे मातरम् का विरोध एक चर्चा का विषय है। क्या विभाजन-पूर्व व वर्तमान स्थितियाँ कांग्रेस पार्टी के लिए एक-सी हैं? यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए। 1937 में कांग्रेस का निर्णय तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में एक रणनीतिक समझौते के रूप में देखा जा सकता था। लेकिन स्वतंत्र भारत के आठ दशकों बाद भी उसी व्यवस्था को अपरिवर्तनीय राजनीतिक परंपरा मान लेना निश्चित रूप से बहस का विषय है। इतिहास को समझना और इतिहास के हर राजनीतिक समझौते को अनंतकाल तक ढोना - दो अलग बातें हैं।

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि भारत की सभ्यतागत स्मृतियाँ ही संदिग्ध बना दी जाएँ। यदि भारत की सांस्कृतिक परंपरा में मातृभूमि को माता के रूप में देखने की अवधारणा है, तो उसे केवल इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसका रूपक आधुनिक राजनीतिक शब्दावली में असुविधाजनक दिखाई देता है।

आज युवा पीढ़ी को यह बात समझनी होगी कि भारत हमारे लिए सर्वोपरि है और कोई भी धार्मिक बंधन मातृभूमि के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को कम नहीं कर सकता। किसी सभ्यता की उदारता का प्रमाण यह नहीं कि वह अपनी पहचान छिपा ले; बल्कि यह है कि वह अपनी पहचान के साथ दूसरों के अस्तित्व को भी सम्मान दे। धार्मिक मान्यता विभिन्न लोगों की अलग-अलग हो सकती है और भारतीय संविधान भी सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखता है। भारत के अंदर एक दर्जन से अधिक धर्मों के लोग निवास करते हैं, लेकिन किसी की धार्मिक नजरिए के आधार पर भारत की अपनी सांस्कृतिक विरासत को बलि नहीं चढ़ाया जा सकता। यह भी महत्वपूर्ण है कि मुस्लिमों के अलावा किसी अन्य धर्म के लोग विरोध नहीं करते। कांग्रेस पार्टी, जोकि राजनीतिक स्तर पर लगातार कमजोर होती जा रही है, उसे मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को त्यागकर आगे बढ़ना चाहिए। धार्मिक उन्माद, सांप्रदायिकता और तुष्टीकरण ने भारत को काफी पीछे कर दिया था, जबकि आज विकास के रथ पर आरूढ़ होकर हम विकसित देश बनने की तरफ बढ़ रहे हैं।

अंततः, वंदे मातरम् का प्रश्न केवल दो छंदों या छह छंदों का प्रश्न नहीं है; यह प्रश्न है कि हम अपने इतिहास, अपनी सभ्यता और अपनी राष्ट्रीय चेतना को किस दृष्टि से देखते हैं। भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं थी, बल्कि अपनी अस्मिता, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना को पुनः प्राप्त करने का भी संघर्ष थी। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी विरासत को किसी राजनीतिक दल की सुविधा, किसी तात्कालिक विवाद या किसी धार्मिक आग्रह के चश्मे से न देखें। जो गीत करोड़ों भारतीयों के लिए स्वतंत्रता के संघर्ष का उद्घोष रहा, उसे उसकी संपूर्णता और ऐतिहासिक संदर्भ के साथ समझना ही उसके प्रति सच्चा सम्मान है। भारत की विविधता का सम्मान करते हुए अपनी सभ्यतागत पहचान पर गर्व करना ही वास्तविक भारतीयता है। वंदे मातरम् किसी के विरुद्ध उद्घोष नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता, समर्पण और गौरव का उद्घोष है। इसलिए समय आ गया है कि हम इतिहास के राजनीतिक समझौतों से आगे बढ़ें और अपनी राष्ट्रीय चेतना को बिना किसी संकोच के पूर्ण स्वर दें - वंदे मातरम्।

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