आज
भारत में
एक वैचारिक
टकराव उभर
रहा है, जिस पर
सरकार को
गंभीरता से
विचार करने
की आवश्यकता है। एक ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों के पुनर्स्थापन का प्रयास हो रहा है, तो दूसरी ओर सरकार की कुछ नीतियों तथा न्यायपालिका की व्याख्याओं में पश्चिमी उदारवाद से प्रेरित व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लैंगिक और पहचान-आधारित अधिकारों का विस्तार दिखाई देता है। भारत आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वैचारिक द्वंद के साथ-साथ दिशा की अस्पष्टता भी दिखाई देती है। सोशल मीडिया से प्रभावित युवा, विश्वविद्यालय परिसरों में उभरती नई वैचारिक संस्कृति, लिव-इन संबंधों को प्राप्त न्यायिक संरक्षण तथा निजता, व्यक्तिगत विकल्प और लैंगिक अधिकारों की विस्तृत संवैधानिक व्याख्याएँ इस परिवर्तन की ओर संकेत करती हैं। प्रश्न यह नहीं कि कौन-सी धारा सही है, बल्कि यह है कि क्या भारतीय राज्य अपनी सभ्यतागत दिशा को लेकर पूर्णतः स्पष्ट है? यदि शिक्षा और राष्ट्र-निर्माण की नीतियाँ भारतीय मूल्यों पर आधारित नागरिक गढ़ना चाहती हैं, जबकि विधिक और सामाजिक विमर्श समानांतर रूप से एक भिन्न मूल्य-दृष्टि को वैधता प्रदान करता है, तो आने वाली पीढ़ी किस वैचारिक आधार पर अपना राष्ट्रीय चरित्र निर्मित करेगी?
इस
वैचारिक द्वंद
को समझने
के लिए
यह जानना
आवश्यक है
कि भारत
के संविधान
निर्माताओं ने
भारतीय राज्य
की बुनियाद
किन मूल्यों
पर रखी
थी। संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता, समानता और मौलिक अधिकारों को स्वीकार करते हुए उन्हें भारतीय समाज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं से जोड़ने का प्रयास किया। यही कारण है कि मौलिक अधिकारों के साथ नीति-निर्देशक तत्व, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार, ग्राम पंचायत, समान नागरिक संहिता का लक्ष्य, गौ-संरक्षण तथा बाद में मौलिक कर्तव्यों को भी संविधान में स्थान मिला। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि "संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है, उसका विकास करना पड़ता है", जबकि
के. एम.
मुंशी सहित
अनेक सदस्यों
ने इस
बात पर
बल दिया
कि भारत
की लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से पृथक नहीं हो सकती। स्पष्ट है कि संविधान का उद्देश्य केवल अधिकारों की स्थापना नहीं, बल्कि अधिकारों और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना था।
यह
संतुलन आकस्मिक
नहीं था।
इसके पीछे
भारतीय राजनीतिक चिंतन की वह परंपरा थी, जिसने व्यक्ति को परिवार, समाज और राष्ट्र से पृथक नहीं देखा। महात्मा
गांधी ने हिंद स्वराज में
अधिकारों से
पहले कर्तव्यों पर बल दिया, स्वामी विवेकानंद ने व्यक्ति की उन्नति को राष्ट्रसेवा से जोड़ा, श्री अरविंद ने राष्ट्र को सांस्कृतिक चेतना माना और पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म
मानववाद के माध्यम से व्यक्ति, परिवार, समाज
और राष्ट्र
के समन्वित
विकास की
अवधारणा प्रस्तुत की। इसके विपरीत आधुनिक पश्चिमी उदारवादी चिंतन जॉन लॉक, जॉन स्टुअर्ट मिल और जॉन रॉल्स जैसे विचारकों के माध्यम से व्यक्ति
की स्वतंत्रता, अधिकारों और व्यक्तिगत स्वायत्तता को राजनीतिक व्यवस्था का केंद्र मानता है। दूसरे शब्दों में, भारतीय दृष्टि व्यक्ति को संबंधों और कर्तव्यों से परिभाषित करती है, जबकि आधुनिक उदारवादी दृष्टि व्यक्ति को उसके अधिकारों और स्वायत्तता से।
यही
वैचारिक अंतर
आज भारत
की नीतियों
और संस्थागत निर्णयों में भी दिखाई देने लगा है। यदि भारतीय राज्य एक ओर सनातन मूल्यों, भारतीय
ज्ञान परंपरा
और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बात करता है, तो क्या दूसरी ओर पश्चिमी उदारवादी अवधारणाओं को बढ़ती वैधानिक और संस्थागत स्वीकार्यता मिलने के दीर्घकालिक सामाजिक प्रभावों पर भी समान गंभीरता से विचार किया जा रहा है? क्या "नित नूतन, चिर पुरातन" का संतुलन वास्तव में बना हुआ है, या भारतीय सामाजिक व्यवस्था धीरे-धीरे ऐसे वैचारिक प्रतिमानों की ओर बढ़ रही है, जिनके परिणामों पर स्वयं पश्चिमी समाज पुनर्विचार कर रहा है?
इस
वैचारिक परिवर्तन की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति पिछले एक दशक में न्यायपालिका की संवैधानिक व्याख्याओं में दिखाई देती है। पिछले
एक दशक
में सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा, निजता और स्वायत्तता की संवैधानिक व्याख्या का विस्तार किया है। न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से पश्चिमी उदारवादी अवधारणाएँ भारतीय सामाजिक जीवन में क्रमशः प्रवेश कर रही हैं। यह भी कहा जा सकता है कि बिना दूरदर्शी विचार किए आज न्यायपालिका इन अवधारणाओं को हमारे समाज में प्रवेश कराने का आसान मार्ग है। नवतेज सिंह जौहर (2018) के निर्णय ने सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर व्यक्तिगत यौन स्वायत्तता को संवैधानिक संरक्षण दिया। इससे समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता देने की आवाजें तेज हुईं। 2023 में
भले ही
सर्वोच्च न्यायालय समलैंगिक शादी को कानूनी रूप देने का अधिकार संसद के लिए छोड़ दिया लेकिन समाज व्यवस्था मे इन आवाजों को मजबूती प्रदान की।
व्यक्तिवादी अवधारणा का यही दृष्टिकोण विवाह संस्था से जुड़े अन्य प्रश्नों में भी दिखाई देता है। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को
असंवैधानिक घोषित
करते हुए
व्यभिचार को
अपराध की
श्रेणी से
बाहर कर
दिया। न्यायालय ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता
और गरिमा
के सिद्धांतों के आधार पर उचित ठहराया। इस फैसले मे व्यभिचार को विवाह विच्छेद के लिए वैध आधार माना। इससे न सिर्फ सामाजिक
बुराई को
पनपने का
रास्ता खोल
दिया गया
बल्कि विवाह
जैसे मजबूत
सामाजिक व्यवस्था को खंडित करने के लिए एक आसान रास्ता तैयार किया गया। यह भारत को उसी पश्चिमी समाज की तरफ धकेल देगा जहाँ हर वर्ष टूटते रिश्ते आम बात है और अनिश्चितता भरे अंधकार युक्त भविष्य में ऐसे दम्पत्तियों के बच्चों को धकेल दिया जाता है।
यदि
विवाह के
भीतर व्यक्तिगत स्वायत्तता की नई व्याख्या सामने आई है, तो विवाह के बाहर सहजीवन (लिव
इन) को
लेकर भी
न्यायपालिका का
दृष्टिकोण उल्लेखनीय रूप से विकसित हुआ है। विवाह एक विधिक एवं सामाजिक संस्था है, जिसके विघटन के लिए न्यायिक प्रक्रिया (तलाक) और वैधानिक उत्तरदायित्व निर्धारित हैं। विवाह
सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ शुरू होता है। ऐसे में बिना विवाह के साथ रहने को भले ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर सही ठहराया जाए लेकिन यह सामाजिक व्यवस्थाओं को तोड़ता है। विवाह के बिना सहजीवन यानि लिव इन को सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में टिप्पणी की कि यह न अपराध है, न पाप। वहीं 2010 में
लिव इन
को अनैतिक
मानने से
इनकार कर
दिया था।
भारतीय
न्यायपालिका का
संवैधानिक दायित्व
नागरिकों के
अधिकारों की
रक्षा करना
है, न
कि समाज
के नैतिक
या सांस्कृतिक मानदंड निर्धारित करना। किंतु जब न्यायिक व्याख्याएँ बार-बार किसी विशेष जीवन-पद्धति को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करती हैं, तो उनका प्रभाव केवल न्यायालय तक सीमित नहीं रहता; वे समाज की सार्वजनिक स्वीकृति, राज्य की नीतियों और भविष्य के विधायी विमर्श को भी प्रभावित करती हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या सामाजिक संस्थाओं, सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत मूल्यों को भी समान संवैधानिक महत्व मिल रहा है, या अधिकारों की व्याख्या क्रमशः व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है।
यह
प्रवृत्ति केवल
परिवार और
विवाह तक
सीमित नहीं
रही, बल्कि
धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों में भी दिखाई दी। सबरीमला प्रकरण में भी न्यायालय ने धार्मिक परंपराओं का मूल्यांकन मुख्यतः संवैधानिक समानता के मानदंड पर किया। इस दृष्टिकोण में भारतीय धार्मिक परंपराओं की उपेक्षा हुई जैसा नास्तिक समाज में होता आया है। यदि भारत स्वयं को एक सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में पुनर्परिभाषित करना चाहता है, तो यह विचारणीय है कि क्या अधिकार और स्वायत्तता की संवैधानिक व्याख्या के साथ-साथ भारतीय सामाजिक दर्शन के मूल तत्वों को भी न्यायिक विमर्श में पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए?
यदि
इस वैचारिक
परिवर्तन के
संभावित सामाजिक
परिणामों को
समझना हो, तो पश्चिमी
समाजों के
अनुभवों पर
भी दृष्टि
डालना आवश्यक
है। एलन
एहरेनहाल्ट अपनी
पुस्तक द लॉस्ट सिटी: द फॉरगॉटन वर्च्यूज़ ऑफ कम्युनिटी इन अमेरिका में बताते हैं कि किस प्रकार अमेरिका में व्यक्तिगत विकल्प को सर्वोच्च सामाजिक मूल्य बनाए जाने के साथ पड़ोस संस्कृति और सामुदायिक उत्तरदायित्व कमजोर होते गए। इसी प्रकार रॉबर्ट डी. पुटनम ने बॉलिंग अलोन में सामाजिक पूंजी (सोशल कैपिटल) के
क्षरण का
विश्लेषण करते
हुए दिखाया
कि परिवार, स्थानीय समुदाय और नागरिक सहभागिता के कमजोर होने से सामाजिक विश्वास तथा सामुदायिक जीवन भी प्रभावित होता है। दोनों
लेखक भिन्न
संदर्भों में
लिखते हैं, किंतु दोनों
का निष्कर्ष सामाजिक संस्थाओं और सामुदायिक पूंजी के क्षरण को लेकर चिंता व्यक्त करता है। यह अनुभव भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय समाज की स्थिरता का आधार केवल राज्य नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक संस्थाएँ भी हैं। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सामाजिक संस्थाएँ परिवार, पड़ोस, समुदाय और सांस्कृतिक परंपराएँ रही हैं जो
व्यक्ति को
केवल अधिकारों का धारक नहीं, बल्कि उत्तरदायी नागरिक बनाती हैं।
व्यक्तिगत अधिकार किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला हैं और उनका संरक्षण आवश्यक है। किंतु यदि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की व्याख्या क्रमशः परिवार, विवाह, समुदाय और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी संस्थाओं से पृथक होकर विकसित होती है, तो यह विचार करना आवश्यक है कि उसका दीर्घकालिक प्रभाव भारतीय सामाजिक संरचना पर क्या होगा। क्या भारत भी वही सामाजिक प्रयोग दोहरा रहा है, जिनके परिणामों पर आज अनेक पश्चिमी समाज पुनर्विचार कर रहे हैं? क्या आधुनिकता का भारतीय मॉडल अपनी सभ्यतागत विशेषताओं के साथ विकसित होगा, या वह धीरे-धीरे उसी व्यक्तिवादी दिशा में अग्रसर होगा जिसने पश्चिम में परिवार और समुदाय की भूमिका को चुनौती दी? यदि राज्य की विभिन्न संस्थाएँ भिन्न-भिन्न वैचारिक दिशाओं में आगे बढ़ती रहीं, तो यह केवल नीतिगत असंगति का विषय नहीं रहेगा, बल्कि भारत की सभ्यतागत दिशा का प्रश्न बन जाएगा।
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